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तमाम अहले ईमान वालो को ग्यारहवीं शरीफ की मुबारकबाद।

 
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शब-ए-बरात पर विशेष लेख

 सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी की ओर से शब-ए-बरात पर विशेष लेख शब-ए-बरात रहमत, मग़फ़िरत और निज़ात की वह मुक़द्दस रात है, जो अल्लाह तआला की बेशुमार नेमतों और उसकी असीम रहमतों की याद दिलाती है। यह रात इंसान को अपने गुनाहों पर नदामत, तौबा और अपने रब से क़रीबी का पैग़ाम देती है। शाबान महीने की यह बाबरकत रात हर मोमिन के लिए अपने आमाल का मुहासबा करने और अल्लाह की बारगाह में झुक जाने का बेहतरीन मौक़ा है। इस मुक़द्दस रात में अल्लाह तआला अपने बंदों पर ख़ास करम फ़रमाता है। गुनाहों की माफ़ी के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और तौबा क़ुबूल की जाती है। हदीसों में आया है कि इस रात अल्लाह अपनी मख़लूक़ की तरफ़ रहमत की निगाह से देखता है और सच्चे दिल से तौबा करने वालों को बख़्श देता है। यही वजह है कि शब-ए-बरात को इबादत, दुआ और इस्तिग़फ़ार की रात कहा गया है। सूफ़िया-ए-किराम ने हमेशा इस रात को दिलों की इस्लाह और रूह की पाकीज़गी का ज़रिया बताया है। नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र-ओ-अज़कार और दुआओं के ज़रिये इंसान अपने रब से रिश्ता मज़बूत करता है। साथ ही यह रात हमें यह भी सिखाती है कि हम अपने दिलों से कीना, हसद...

नमाज़: हर मोमिन की मेराज — शबे-मेराज की रात और सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी की रूहानी आवाज़

शबे-मेराज कोई साधारण रात नहीं—यह रूह के जागने, दिल के पिघलने और बंदे के अल्लाह से मिलने की मुक़द्दस घड़ी है। यह वही शब है जब ज़मीन-ओ-आसमाँ के फ़ासले मिट गए, और मोहब्बत-ए-इलाही ने अपने महबूब, प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को अपने क़रीब बुला लिया। इसी रात का सबसे बड़ा तोहफ़ा नमाज़ है!  27 रजब 1447 हिजरी — शबे-मेराज 2026 भारत में: 16 जनवरी 2026 मगरिब के बाद, शाम से  17 जनवरी 2026 फ़ज्र, सुबह तक!  सूफ़ियों की नज़र में मेराज महज़ एक सफ़र नहीं, बल्कि फ़ना से बक़ा तक की मंज़िल है—जहाँ “मैं” मिटती है और “वह” बाक़ी रहता है।—सूफ़ियाना राह का सर्वोच्च ज़िक्र; जहाँ लब ख़ामोश हो जाते हैं और दिल बोलने लगता है, जहाँ सजदा इंसान को आसमानों से भी ऊँचा उठा देता है। शबे-मेराज हमें यह भी सिखाती है कि जब ज़िंदगी इम्तिहान बन जाए, रास्ते अँधेरे लगें और नफ़्स का शोर बढ़ जाए—तो सब्र, इश्क़ और यक़ीन का दिया जलाए रखना चाहिए। यही दिया रूह को मेराज की ऊँचाइयों तक ले जाता है। सूफ़ियाना पैग़ाम सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं: “मेराज नबी ﷺ की है, मगर नमाज़ हर मोमिन की मेराज है।” यानी जो बंदा सच्चे दिल...

ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स: मोहब्बत, सेवा और इंसानियत का पैग़ाम

 अजमेर: सूफ़ी संत हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, जिन्हें दुनिया ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से जानती है, का उर्स हर वर्ष अजमेर शरीफ़ में अकीदत और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उर्स का अर्थ है ‘विसाल’—अर्थात अल्लाह से मिलन। इस वर्ष ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स दिसंबर 2025 में 22 दिसंबर से 30 दिसंबर तक मनाया जा रहा है, जबकि झंडा रस्म के साथ इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है। देश-विदेश से लाखों जायरीन अजमेर पहुँचकर अपने दिलों की मुरादें पेश कर रहे हैं। ख्वाजा गरीब नवाज़ का जीवन मानवता के लिए एक खुली किताब है। उन्होंने अपने आचरण से यह साबित किया कि मज़हब का असली अर्थ इंसान से मोहब्बत करना है। उनकी सबसे बड़ी शिक्षा थी—“सबसे प्रेम करो, किसी से बैर मत रखो।” उन्होंने भूखों को खाना खिलाना, दुखियों की मदद करना और पीड़ितों के आंसू पोंछना ही सच्ची इबादत बताया। यही कारण है कि आज भी उनके दर पर हर धर्म, हर वर्ग और हर भाषा के लोग सिर झुकाते हैं। उर्स के दौरान चादरपोशी, कव्वालियाँ और लंगर जैसी रस्में केवल परंपरा नहीं, बल्कि सेवा और समानता का प्रतीक हैं। लंगर में अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, सि...

असली सूफ़ी कौन होता है? | Sufi Aijaz Alam Khan Qadri Bayan | Mohabbat Aur Insaniyat 🌹

सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी का बयान: “सूफ़ी होना किसी लिबास का नाम नहीं, यह दिल की हालत का नाम है। जो दिल अल्लाह की मोहब्बत से भर जाए और हर मख़लूक़ को अपना समझे, वही असली सूफ़ी है। हम नफ़रत नहीं बाँटते, हम मोहब्बत बोते हैं। हम दीवारें नहीं उठाते, हम दिलों को जोड़ते हैं। जो अपने नफ़्स को जीत ले, वही अल्लाह के क़रीब होता है। और जो इंसान से प्यार करे, वही रहमान का प्यारा बनता है।” — सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी 🌹

इस्लामी स्टोरी हदीस की रोशनी मे पढ़े

  इस्लामी स्टोरी — कुएँ का कुत्ता और अल्लाह की रहमत (सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की हदीस) एक बार बहुत गर्म मौसम में एक आदमी रास्ते से गुज़र रहा था। उसे बहुत प्यास लगी। रास्ते में एक कुआँ मिला, वह नीचे उतरा, पानी पिया और ऊपर आने लगा। ऊपर पहुंचा तो देखा कि एक कुत्ता मिट्टी चाट रहा है और साँस फूल रही है, प्यास से बहुत परेशान था। उस आदमी के दिल में रहम आया और उसने कहा: “यह कुत्ता भी वही तकलीफ़ झेल रहा है, जो मैं झेलकर आया हूँ।” वह दोबारा कुएँ में उतरा, अपने जूते में पानी भरा, और कुत्ते को पिला दिया। अल्लाह तआला उस आदमी के इस रवैये से इतना खुश हुआ कि अल्लाह ने उसके सारे गुनाह माफ कर दिए। صحابہ ने पूछा: “ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ, क्या जानवरों पर रहम करने में भी सवाब है?” रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “हर ज़िन्दा दिल वाली चीज़ पर रहम करने में सवाब है।” 📌 हदीस का हवाला ✔ सहीह अल-बुख़ारी — हदीस नं. 2466 ✔ सहीह मुस्लिम — हदीस नं. 2244 🌟 सबक इस हदीस से पता चलता है कि: ✔ अल्लाह की रहमत के दरवाज़े बहुत बड़े हैं ✔ छोटी सी भलाई भी अल्लाह को बहुत पसंद हो सकती है ✔ रहम सिर्फ इंसानों पर नहीं — हर जानदार पर ...

“Qadri Baba Basti: रूहानी इलाज से Negative Energy और जिन्न असर का चमत्कारिक हल | Spiritual Healing”

 Qadri Baba Basti:बस्ती की पवित्र मिट्टी पर रूहानियत का जो नूर बरसता है, उसकी एक जगमगाती किरण आज हज़ारों दिलों को सुकून, हौसला और उम्मीद दे रही है— सूफ़ी हज़रत एजाज़ आलम खान क़ादरी उर्फ़ क़ादरी बाबा. दारुल उलूम इस्लामिया फ़ैज़ाने आलम, दमया परसा के प्रिंसिपल और आलम रूहानी मिशन, बस्ती के अध्यक्ष के तौर पर क़ादरी बाबा दुआ, मुराक़बा व तसव्वुरात और तिब्ब-ए-नबवी की रौशन राह पर और रूहानी शर्बत पिलाकर लोगों की मदद का बड़ा वसीला बने हुए हैं। वे अक्सर फरमाते हैं— “जहाँ इंसानी कोशिश रुक जाती है, वहीं दुआ और रूहानी इल्म रहस्य की नई मंज़िलें खोल देता है।” 🔮 नकारात्मक असर और अदृश्य परेशानियों में रूहानी हल हर दिन उनके पास ऐसे लोग पहुँचते हैं जो नकारात्मक ऊर्जा, आसेब, जिन्न, रहस्यमयी आवाज़ें, घर में डर, कारोबार में रुकावट, बेचैनी जैसी उलझनों में घिरे होते हैं। क़ादरी बाबा सही तरतीब, रूहानी शर्बत, दुआ और रूहानी बंदिश के ज़रिए उन्हें सुकून, करार और राहत का रास्ता दिखाते हैं। उनका कहना है— “जो परेशानी आँखों से नज़र न आए, उसका हल भी रूहानी दुनिया में ही मिलता है।” 🔴 अमोली गाँव का हैरान कर देने वाला...

सऊदी बस हादसा: उमरा पर गए 42 भारतीय ज़ायरीन की दर्दनाक मौत से देश में मातम

सऊदी बस हादसा: उमरा ज़ायरीन की मौत से पूरे भारत में मातम सऊदी अरब में आज जो दर्दनाक सऊदी बस हादसा हुआ, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। मक्का से मदीना जा रही बस में उमरा के सफ़र पर निकले हमारे 42 भारतीय मुसाफ़िर चंद ही पलों में मौत के मुंह में समा गए। उमरा के सफ़र में दर्दनाक मोड़ सोचिए—जो लोग अल्लाह के घर की ज़ियारत के लिए रवाना हुए थे, जिनकी ज़ुबान पर “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” की गूंज थी, उन्हीं में से कई लोग अपनी आख़िरी सांस उसी मुक़द्दस सरज़मीन पर छोड़ गए। किसी को क्या पता था कि इबादत का यह सफ़र उनकी आख़िरी मंज़िल बन जाएगा। टक्कर इतनी भयानक थी कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। कई लोग नींद में थे, किसी ने घर वालों के लिए दुआ की होगी, किसी के दिल में कोई अधूरी तमन्ना रही होगी, और किसी को शायद एहसास तक नहीं हुआ कि यही उनका आख़िरी सफ़र है। ज़िंदगी की नाज़ुक हकीकत ऐसी ख़बरें इंसान को भीतर तक तोड़ देती हैं। ज़िंदगी कितनी नाज़ुक और मौत कितनी क़रीब होती है—यह हादसा इसका सबसे बड़ा सबूत है। हम हज़ारों प्लान बनाते हैं, लेकिन अल्लाह की तदबीर सब पर ग़ालिब होत...