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शब-ए-बरात पर विशेष लेख

 सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी की ओर से

शब-ए-बरात पर विशेष लेख

शब-ए-बरात रहमत, मग़फ़िरत और निज़ात की वह मुक़द्दस रात है, जो अल्लाह तआला की बेशुमार नेमतों और उसकी असीम रहमतों की याद दिलाती है। यह रात इंसान को अपने गुनाहों पर नदामत, तौबा और अपने रब से क़रीबी का पैग़ाम देती है। शाबान महीने की यह बाबरकत रात हर मोमिन के लिए अपने आमाल का मुहासबा करने और अल्लाह की बारगाह में झुक जाने का बेहतरीन मौक़ा है।

इस मुक़द्दस रात में अल्लाह तआला अपने बंदों पर ख़ास करम फ़रमाता है। गुनाहों की माफ़ी के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और तौबा क़ुबूल की जाती है। हदीसों में आया है कि इस रात अल्लाह अपनी मख़लूक़ की तरफ़ रहमत की निगाह से देखता है और सच्चे दिल से तौबा करने वालों को बख़्श देता है। यही वजह है कि शब-ए-बरात को इबादत, दुआ और इस्तिग़फ़ार की रात कहा गया है।



सूफ़िया-ए-किराम ने हमेशा इस रात को दिलों की इस्लाह और रूह की पाकीज़गी का ज़रिया बताया है। नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र-ओ-अज़कार और दुआओं के ज़रिये इंसान अपने रब से रिश्ता मज़बूत करता है। साथ ही यह रात हमें यह भी सिखाती है कि हम अपने दिलों से कीना, हसद और नफ़रत निकालकर मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम आम करें।

शब-ए-बरात का असल पैग़ाम यही है कि इंसान सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी उम्मत और पूरी इंसानियत के लिए दुआ करे। अपने वालिदैन, बुज़ुर्गों और मरहूमीन के लिए दुआ करना, ग़रीबों, मजबूरों और ज़रूरतमंदों की मदद करना इस रात की रूहानी रौनक़ को और बढ़ा देता है।

आइए, इस शब-ए-बरात पर हम सब मिलकर सच्चे दिल से तौबा करें, अल्लाह की बारगाह में सर झुकाएँ और यह अहद करें कि हम अपनी ज़िंदगी को सुन्नत-ए-रसूल ﷺ के मुताबिक़ ढालेंगे। अल्लाह तआला हमें इस मुक़द्दस रात की बरकतों से मालामाल फ़रमाए और हमारे मुल्क में अमन, सुकून और भाईचारा क़ायम रखे।

आमीन।


— सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी

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