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ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स: मोहब्बत, सेवा और इंसानियत का पैग़ाम

 अजमेर: सूफ़ी संत हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, जिन्हें दुनिया ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से जानती है, का उर्स हर वर्ष अजमेर शरीफ़ में अकीदत और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उर्स का अर्थ है ‘विसाल’—अर्थात अल्लाह से मिलन। इस वर्ष ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स दिसंबर 2025 में 22 दिसंबर से 30 दिसंबर तक मनाया जा रहा है, जबकि झंडा रस्म के साथ इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है। देश-विदेश से लाखों जायरीन अजमेर पहुँचकर अपने दिलों की मुरादें पेश कर रहे हैं।

ख्वाजा गरीब नवाज़ का जीवन मानवता के लिए एक खुली किताब है। उन्होंने अपने आचरण से यह साबित किया कि मज़हब का असली अर्थ इंसान से मोहब्बत करना है। उनकी सबसे बड़ी शिक्षा थी—“सबसे प्रेम करो, किसी से बैर मत रखो।” उन्होंने भूखों को खाना खिलाना, दुखियों की मदद करना और पीड़ितों के आंसू पोंछना ही सच्ची इबादत बताया। यही कारण है कि आज भी उनके दर पर हर धर्म, हर वर्ग और हर भाषा के लोग सिर झुकाते हैं।

ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स: मोहब्बत, सेवा और इंसानियत का पैग़ाम

उर्स के दौरान चादरपोशी, कव्वालियाँ और लंगर जैसी रस्में केवल परंपरा नहीं, बल्कि सेवा और समानता का प्रतीक हैं। लंगर में अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई का कोई भेद नहीं होता। सभी एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं—यही ख्वाजा साहब की शिक्षाओं की जीवंत तस्वीर है।

आज के दौर में, जब समाज में नफरत, असहिष्णुता और विभाजन की दीवारें खड़ी की जा रही हैं, ख्वाजा गरीब नवाज़ का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने सिखाया कि दिल जीतने के लिए तलवार नहीं, बल्कि मोहब्बत चाहिए। इंसानियत, क्षमा और सेवा के बिना कोई भी समाज तरक्की नहीं कर सकता।

उर्स का अवसर हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम इस आयोजन को केवल रस्मों तक सीमित न रखें, बल्कि ख्वाजा गरीब नवाज़ की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें। अगर हम भूखों को खाना, दुखियों को सहारा और समाज में प्रेम बाँट सकें, तभी उर्स मनाने की सच्ची सार्थकता होगी।

ख्वाजा गरीब नवाज़ का उर्स वास्तव में इंसानियत का उत्सव है—एक ऐसा उत्सव जो हमें याद दिलाता है कि प्रेम ही सबसे बड़ी ताकत है और इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म।


--सूफी एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादक , AKP News 786

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