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अशरा मुबशरा हदीस और इल्म-ए-ग़ैब – सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी का बयान।

 रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:

अशरा मुबशरा हदीस और इल्म-ए-ग़ैब – सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी का बयान।

“अबू बकर जन्नत में हैं, उमर जन्नत में हैं, उस्मान जन्नत में हैं, अली जन्नत में हैं, तल्हा जन्नत में हैं, जुबैर जन्नत में हैं, अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ जन्नत में हैं, सअद इब्न अबी वक़्क़ास जन्नत में हैं, सईद इब्न ज़ैद जन्नत में हैं, और अबू उबैदा इब्न जर्राह जन्नत में हैं।”

(तिर्मिज़ी शरीफ़, हदीस नं: 3747)

यह वह मुबारक हदीस है जिसमें नबी-ए-पाक ﷺ ने जिन दस सहाबा-ए-किराम को जन्नत की बशारत दी, उन्हें इस्लामी किताबों में "अशरा मुबशरा" (عشرہ مبشرہ) कहा जाता है।

इस हदीस-ए-मुबारका से साफ़ जाहिर है कि अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को इल्म-ए-ग़ैब अता फरमाया है। जन्नत की खुशखबरी देना कोई मामूली बात नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से दी हुई इल्मी रहमत का बयान है।

🌸 आलम रूहानी मिशन बस्ती के प्रधान कार्यालय में आयोजित ईद मिलादुन्नबी ﷺ के मुबारक प्रोग्राम में मिशन के अध्यक्ष सूफी एजाज़ आलम खान कादरी ने तफसील से इस हदीस का बयान किया।

सूफी साहब ने कहा:

➡️ जो लोग नबी-ए-पाक ﷺ को अपने जैसा बताते हैं या ये कहते हैं कि नबी ﷺ को इल्म-ए-ग़ैब नहीं दिया गया, ऐसे लोग हक़ीक़त में गुमराह और जाहिल हैं।

➡️ ऐसे लोगों को चाहिए कि सही हदीसों का मुताला करें, मोहब्बत के साथ समझें, तभी हक़ की पहचान होगी।

अख़िर में सूफी साहब ने दुआ की:

🌿 "अल्लाह तआला हम सबको हिदायत अता फरमाए और अपने हबीब ﷺ की मोहब्बत में ज़िंदगी गुज़ारने की तौफीक बख़्शे। आमीन।"

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